Akhri salaam….abhi nahin

ये हिज्र का दर्द क्यों रुलाता नहीं मुझे
ये क़ुर्बतों का ख़याल क्यों जलाता नहीं मुझे
वो मेरे नहीं मुझे न मिल पाएंगे
ये ख़याल क्यों आता नहीं मुझे
वो गैर के साथ नहीं अपनी मोहब्बत के साथ है
इस बात से दिल बहला क्यों नहीं पाता मुझे
कब तक इंतज़ार की आग रहेगी
अब भी जी कहता है आखिरी सलाम कहना नहीं मुझे

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