ये हिज्र का दर्द क्यों रुलाता नहीं मुझे
ये क़ुर्बतों का ख़याल क्यों जलाता नहीं मुझे
वो मेरे नहीं मुझे न मिल पाएंगे
ये ख़याल क्यों आता नहीं मुझे
वो गैर के साथ नहीं अपनी मोहब्बत के साथ है
इस बात से दिल बहला क्यों नहीं पाता मुझे
कब तक इंतज़ार की आग रहेगी
अब भी जी कहता है आखिरी सलाम कहना नहीं मुझे